control of digestion। Digestive system disorders or irregularities। पाचन क्रिया का नियंत्रण /नियमन। पाचन की तंत्रिकीय नियमन। पाचन तंत्र के विकार या अनियमितताएँ।

 पाचन क्रिया का नियंत्रण /नियमन :- मनुष्य के पाचन तंत्र का नियमन विभिन्न प्रकार के हार्मोनो के द्वारा होता है। जो तंत्रिका तंत्र एवं अंतस्रावी ग्रन्थियों द्वारा स्त्रावित होते है। ये सभी हार्मोन पॉलीपेप्टाइड हार्मोन है। इन हार्मोनो के नाम तथा उनके कार्य निम्न प्रकार से है।                        

                                    स्तनधारियों में पाये जाने वाले गैस्ट्रोइन्टेसटाइनल हार्मोन

हार्मोन

स्रोत

स्त्रावण हेतु उद्दीपन

क्रिया स्थल

लक्ष्य

गैस्ट्रिन

पायलोरिक आमाशय की म्यूकोसा

भोजन के प्रवेश के बाद आमाशय का फूलना 

आमाशय

गैस्ट्रिक जूस के स्राव को बढ़ाता है। कार्डियक स्फिंक्टर को संकुचित करता है।

एन्टरोगैस्ट्राँन

डयूओडिनल एपीथिलियम

डयूओडिनम में चाइम का प्रवेश

आमाशय

यह आमाशय के संकुचन को कम करता है। जिससे इसके खाली होने में देर लगती है। गैस्ट्रिक जूस के स्राव को रोकता है।

सिक्रीटिन

डयूओडिनल एपीथिलियम

डयूओडिनम में अम्लीय चाइम का प्रवेश

Aअग्नाशय

 

 

 

                  Bयकृत

 Cआमाशय

पेन्क्रियाटिक जूस में सोडियम बाइकार्बोनेट की मुक्ति (नो प्रवेश) 

 बाइल के स्राव का बढ़ाव 

गैस्ट्रिन के स्राव का संदमन

कोलीसिस्टोकाइनिन(पैंक्रियोजाइमिन)  CCK

डयूओडिनल एपीथिलियम

डयूओडिनम में वसा  उपस्थिति

Aअग्नाशय

 

 

 पित्ताशय

 पेन्क्रियाटिक रस में एंजाइम को मुक्त करना। 

पित्ताशय से पिट को मुक्त करना

विलिकाइनिन

आंत्रीय उपकला

छोटी आँत में भोजन

आंत्र

विलाई की गति को बढ़ाता है। (अवशोषण बढ़ाएगा)

डयूओक्राइनिन

आंत्रीय उपकला (डयूओडिनल म्यूकोसा)

आंत्र में अम्लीय चाइम की उपस्थिति 

आंत्र (ब्रुनर्स ग्रन्थियाँ)

ब्रुनर्स ग्रन्थियों से चिकने म्यूकस को मुक्त करना (क्षारीय म्यूकस का स्राव )

एन्टरोक्राइनिन

आंत्रीय उपकला (डयूओडिनल म्यूकोसा)

आंत्र में अम्लीय चाइम की उपस्थिति 

आंत्र(लिवरकुहन की दरारे)

लिवरकुहन की दरारों से एन्जाइम्स को मुक्त करना। 

 पाचन की तंत्रिकीय नियमन :- जठरांत्रीय पथ में बाहय तंत्रिका आपूर्ति की तरह अंतनिहित तंत्रिका तंत्र भी होता है।   यह आंतरिक तंत्रिका तंत्र आंत्रीय तंत्रिका तंत्र भी कहलाता है।  जिसके निम्न दो भाग होते है।   

(1) मीजनर का जालक जो सबम्यूकोसा स्तर में स्थित होता है। तथा पाचक रसों के स्त्रावण को नियंत्रित करता है।  

(2) ऑयरबैक का जालक जो पेशीय स्तर में स्थित होता है। और क्रमानुकूंचन गतियों को नियंत्रित करता है।  

आहार नाल की बाहय तंत्रिकीय आपूर्ति में परानुकंपी और अनुकम्पी दोनों तंत्रों की तंत्रिकाएं होती है। जो किसी भी प्रत्यावर्ती क्रिया चाहे G.I.T  में या शरीर के किसी दूसरे भाग में उत्पन्न की गई हो के प्रत्युत्तर में आंतरिक तंत्रिकीय तंत्र की क्रियाशीलता को रूपांतरित कर सकता है।     

पाचन तंत्र के विकार या अनियमितताएँ (Disorder) :- 

(1) आंत्र नलिका का शोथ(Gastroenteritis) :- आंत्र नलिका का शोथ जीवाणुओं और विषाणुओ के सक्रमण होने वाला एक सामान्य विकार है। आंत्र सक्रमण परजीविओं,जैसे फीता कृमि,गोलकृमि,सूत्रकृमि,हुकवर्म,पिनवर्म आदि से भी होता है।     

(2) पीलिया(Jaundice) :- इसमें यकृत प्रभावित होता है. पीलिया में त्वचा और आँख पित्त वर्णकों के जमा होने से पिले रंग के दिखाई देते है।  

(3) वमन(Vomiting) :- यह आमाशय में संग्रहित पदार्थो की मुख से बाहर निकलने की क्रिया है।  यह प्रतिवर्ती क्रिया मैडुला में स्थित वमन केंद्र से नियंत्रित होती है।  उल्टी से पहले बेचैनी की अनुभूति होती है। 

 (4) प्रवाहिका(Diarrhoea) :- आंत्र की अपसामान्य गति की बारंबारता और मल का अत्यधिक पतला हो जाना प्रवाहिक कहलाता है। इसमें भोजन अवशोषण की क्रिया घट जाती है।  

(5) कोष्टबद्वता (कब्ज)(Constipation) :- कब्ज में मलाशय में जल रुक जाता है। ओट आंत्र की गतिशीलता अनियमित हो जाती है।  

(6) अपच(Indigestion)  :- इस स्थिति में भोजन पूरी तरह नहीं पचता है और पेट भरा -भरा महसूस होता है। अपच एंजाइमों के स्राव में कमी,व्यग्रता,खाद्य विषक्ता  अधिक भोजन करने एवं मसालेदार भोजन करने के कारण होती है।      

Digestive system disorders or irregularities


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